कलिता माझी: दूसरों के घरों में काम करने से लेकर विधायक बनने तक

    • Author, रॉक्सी गागडेकर छारा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वालीं कलिता माझी पश्चिम बंगाल की औसग्राम विधानसभा सीट से विधायक चुनी गई हैं.

उनकी यह जीत भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को राज्य में मिली बड़ी कामयाबी के साथ आई है.

कलिता माझी ने टीएमसी के श्यामा प्रसन्ना लोहार को 12,535 वोटों के अंतर से हराया है. बीजेपी को इन चुनावों में कुल 207 सीटों पर जीत मिली है, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) 80 सीटें हासिल कर पाई है.

कोलकाता से क़रीब तीन घंटे की दूरी पर बर्धवान के घुस्कुरा माछपुर पारा में एक संकरी गली में रहने वालीं कलिता मझी कुछ दिन पहले तक घरेलू सहायिका के तौर पर काम कर रही थीं.

कलिता माझी के घर पहुंचने पर सबसे पहले उन्होंने हमें अपना घर दिखाया. उनके छोटे से घर के एक कमरे में उनके पति आराम कर रहे थे.

कलिता माझी ने बताया है कि इस घर में उनके दो देवर और मां भी साथ रहती हैं.

राजनीति में कैसे आईं?

मेहनत-मज़दूरी कर परिवार चलाने वाली कलिता माझी का राजनीति में आना और सफल होना भी किसी हैरानी से कम नहीं है. ख़ासकर ऐसे वक़्त में जब राजनीति करना काफ़ी ख़र्चीला काम है.

कलिता माझी बताती हैं, "मैं साल 2014 में पार्टी की बूथ एजेंट थी. फिर साल 2019 में मुझे घुस्कुरा नगर की ज़िम्मेदारी दी गई. मैं नगर की पार्टी सचिव थी. फिर साल 2021 में पार्टी ने मुझे विधानसभा चुनावों के लिए टिकट दिया."

उन चुनावों में कलिता माझी को टीएमसी के अभेदानंद थंडर ने 11,815 वोटों से हरा दिया था. हालांकि इस हार के बाद भी उनका राजनीतिक सफ़र जारी रहा.

उस साल हुए विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने 293 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 77 सीटों पर जीत मिली थी.

वह बताती हैं, "साल 2022 में मुझे बर्धवान ज़िले के लिए पार्टी सचिव नियुक्त किया गया. 2024 में मैंने पार्टी के लिए एक आम कार्यकर्ता के तौर पर काम किया. साल 2025 में मुझे बोलपुर ज़िले के लिए पार्टी का महासचिव बनाया गया और 2026 में पार्टी ने मुझे फिर से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया."

पार्टी ने उन पर भरोसा जताया, इसके लिए वो बीजेपी का धन्यवाद करती हैं. लेकिन क्या चुनाव लड़ने में उन्होंने कभी दिलचस्पी दिखाई या पार्टी से टिकट मांगा था?

कलिता माझी कहती हैं, "नहीं, नहीं. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं विधायक बन सकती हूँ, क्योंकि मैं एक साधारण परिवार से हूँ. मेरे माता-पिता पैसे वाले नहीं हैं और मेरे ससुराल वाले भी आर्थिक रूप से उतने मज़बूत नहीं हैं."

"घर चलाने के लिए मैं एक घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती थी. मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी और न ही कभी सपना देखा था कि मैं इस मुकाम तक पहुंच पाऊंगी. सिर्फ़ बीजेपी जैसी पार्टी ही ऐसी चीज़ें मुमकिन कर सकती है और हम जैसे लोगों को मौक़ा दे सकती है."

कलिता माझी के मुताबिक़, "मैंने कभी टिकट मिलने के बारे में सोचा भी नहीं था. साल 2021 में जब पार्टी ने मुझे टिकट दिया, तो मैं सचमुच रो रही थी और सोच रही थी कि 'पार्टी ने मेरे साथ यह क्या किया?' मुझे पता नहीं था कि क्या मैं यह सब संभाल पाऊँगी?"

कलिता माझी ने बताया कि साल 2021 के चुनावों में उनके भाई समान दो लोगों (चंद्रचूड़ पात्रा और प्रदीप तिवारी) ने उनकी काफ़ी मदद की और साथ मिलकर काम किया.

परिवार का रुख़ क्या था?

कलिता माझी ने बताया कि राजनीति में उनके ससुर ने उनकी काफ़ी मदद की और सहारा दिया. हालाँकि वो कलिता को विधायक बनते नहीं देख पाए.

कलिता के ससुर का क़रीब दो साल पहले निधन हो गया.

कलिता याद करती हैं, "साल 2021 में, जब मेरे ससुर को पता चला कि पार्टी मुझे टिकट देने पर विचार कर रही है तो वो मेरे पास आए और पूछा कि बौमा (बहू), क्या तुम अपनी पूरी ज़िंदगी एक घरेलू सहायिका के तौर पर ही काम करती रहोगी? तुम हमारे लिए तो इतना कुछ कर ही रही हो, पर क्या तुम समाज के लिए कुछ नहीं करोगी?"

कलिता बताती हैं कि उन्होंने अपने ससुर से कहा कि राजनीति में शामिल होने से उन्हें पार्टी को समय देना होगा और इससे परिवार के लिए उनके पास समय की कमी हो जाएगी.

लेकिन कलिता को उनके ससुर ने घर की चिंता से दूर रहने को कहा और इस तरह उन्हें ससुर, सास, दोनों देवर और पाँचों ननदों का साथ मिल गया.

कलिता की शादी साल 2006 में हुई थी. उसके बाद दो साल तक उन्होंने अपने घर और बच्चों की देखभाल की, ​फिर परिवार को आर्थिक मदद देने के लिए उन्होंने मेड का काम शुरू किया.

वह बताती हैं, "​जब मेरा बेटा तीन या चार साल का था, तब मैंने एक मेड के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. हमारी आर्थिक हालत कमज़ोर थी. एक-दूसरे की मदद से हमने किसी तरह परिवार में चीज़ों को संभाला."

साल 2008 से कलिता ने एक घरेलू सहायिका के तौर पर काम करना शुरू कर दिया, जो पिछले दिनों उनके विधायक बनने के कुछ दिन पहले तक जारी रहा.

वह बताती हैं, "विधानसभा का टिकट मिलने के बाद भी, मैंने अगले सात दिनों तक एक मेड के तौर पर काम किया. अपना नॉमिनेशन फ़ाइल करने और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के दायरे में आने के बाद, मैंने यह काम बंद कर दिया, क्योंकि चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, उम्मीदवार सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक प्रचार कर सकते हैं."

"अगर मैं एक घरेलू सहायिका के तौर पर काम करती, तो मैं प्रचार नहीं कर पाती. उस समय जिन लोगों के घरों में मैं काम करती थी, उन्होंने मुझसे कहा कि बहू पार्टी ने तुम्हें एक बड़ी ज़िम्मेदारी दी है. घर के काम की चिंता मत करो, हम यह संभाल लेंगे. पार्टी ने तुम्हें बहुत बड़ा सम्मान दिया है."

लोगों की क्या प्रतिक्रिया होती थी?

कलिता माझी बताती हैं कि जिन घरों में वो काम करती थीं, वहां के लोगों ने हमेशा ही उन्हें अपनी बेटी और बहन माना.

पश्चिम बंगाल में अक्सर चुनावी हिंसा की ख़बरें आती रही हैं. हालाँकि इस बार के चुनाव में आम तौर पर शांति देखी गई, फिर भी चुनाव परिणाम आने के बाद राज्य में कई जगहों पर हिंसा हुई है.

क्या कलिता माझी को राज्य में राजनीतिक हिंसा के इतिहास से कभी डर लगा?

कलिता कहती हैं, "मुझे इन सब बातों से कभी डर नहीं लगा. 2021 में, चुनाव के बाद हमारे इलाक़े में हिंसा भड़क उठी थी. उस साल 2 मई को चुनाव के नतीजे घोषित हुए थे. 4 मई को, लोगों का एक बड़ा हुजूम सरकारी और निजी संपत्ति को नुक़सान पहुंचा रहा था. लेकिन उस समय भी मुझे ज़रा भी डर नहीं लगा."

राजनीति, परिवार और काम

कलिता बताती हैं कि वह रोज़ सुबह 5:30 बजे उठ जाती थीं, और घर के सारे काम निपटाने के बाद, सुबह 6:30 से 7 बजे तक काम पर निकल जाती थीं.

अपना काम ख़त्म करने के बाद वो पार्टी के लिए काम करती थीं.

कलिता बताती हैं, "शाम को, घर के सारे काम और शाम की चाय वगैरह के बाद, मैं फिर से पार्टी के लिए काम करती थी. परिवार में भी बहुत सारे काम होते हैं. कुछ काम ऐसे होते हैं जिन्हें धीरे-धीरे, एक-एक करके ही किया जा सकता है. जैसे आज यह काम कर लिया, कल वह काम पूरा किया."

कलिता कहती हैं कि जंगलमहल के उनके इलाक़े में आज भी कई बुनियादी सुविधाएँ मौजूद नहीं हैं.

उनका आरोप है, "केंद्र सरकार की कोई भी कल्याणकारी योजना इस इलाक़े तक नहीं पहुंची है. यह मेरा फ़र्ज़ है कि लोगों को सरकारी फ़ायदे मिलें. मेरे शहर के हेल्थ सेंटर में कोई फुल-टाइम डॉक्टर नहीं है. अगर कोई मरीज़ हेल्थ सेंटर जाता है और बिजली चली जाती है, तो वहाँ कोई जनरेटर भी नहीं है. हालात हमारी समझ से भी ज़्यादा ख़राब हैं. डॉक्टर टॉर्च और मोबाइल फ़ोन की लाइट जलाकर इलाज कर रहे हैं."

हमने शहर और गाँवों में कई महिलाओं से बात की. उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता रहती है.

इस मुद्दे पर कलिता माझी कहती हैं, "महिलाओं को सुरक्षा देना हमारी ज़िम्मेदारी है. मुझे यह इतना बड़ा पद आम लोगों के आशीर्वाद से मिला है. उन्हीं की वजह से मैं विधायक बनी हूँ. मैं लोगों के आदेशों का पालन करूंगी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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