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पश्चिम बंगाल: जहाँगीर ख़ान मामले को टीएमसी के बड़े संकट के तौर पर क्यों देखा जा रहा है?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
फाल्टा असेंबली सीट टीमसी सांसद और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र डायमंड हार्बर में आती है. फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में 21 मई को फिर से मतदान है.
चुनाव आयोग ने 29 अप्रैल को हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में कम से कम 60 मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी पाए जाने के बाद फिर से मतदान की घोषणा की थी.
फाल्टा से टीएमसी ने 41 साल के जहाँगीर ख़ान को उम्मीदवार बनाया था लेकिन मतदान से दो दिन पहले उन्होंने ख़ुद को चुनावी रेस से बाहर कर लिया.
हालांकि ख़ान ने नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि गुज़रने के कई दिनों बाद चुनावी मुक़ाबले से हटने की घोषणा की है, इसलिए उनका नाम ईवीएम पर बना रहेगा.
पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि जहाँगीर ख़ान को चुनावी रेस से बाहर होने को किसी एक आम घटना के तौर पर नहीं देखा जा सकता है. कई विश्लेषक इसे विपक्ष में रहते हुए टीएमसी की आने वाली बड़ी मुश्किलों की ओर इशारा कर रहे हैं. चार मई को पश्चिम बंगाल में मतगणना हुई थी और बीजेपी को ऐतिहासिक जीत मिली.
जहाँगीर ख़ान के ख़िलाफ़ मतदाताओं को कथित धमकी और चुनावी अनियमितताओं के मामले में पाँच, 10 और 15 मई को कुल पाँच एफ़आईआर दर्ज हुई थीं.
बीजेपी की जीत के बाद दर्ज हुए थे मुक़दमे
18 मई को कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने फाल्टा में फिर से मतदान प्रक्रिया पूरी होने तक गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी.
लेकिन एक दिन बाद ही जहाँगीर ख़ान ने अचानक से चुनावी रेस से बाहर होने की घोषणा कर दी. तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि यह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला है न कि पार्टी का.
पूरे मामले पर जहाँगीर ख़ान ने कहा, "मैं फाल्टा की मिट्टी का बेटा हूँ. मैं हमेशा फाल्टा में शांति और विकास चाहता हूँ. मेरा सपना फाल्टा को सुंदर बनाना था. मुख्यमंत्री फाल्टा के लिए एक विशेष पैकेज देंगे और इसी वजह से मैं 21 मई को होने वाले मतदान से ख़ुद को अलग कर रहा हूँ."
अगर जहाँगीर ख़ान को चुनावी रेस से बाहर ही होना था तो नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख़ से पहले ऐसा कर सकते थे.
टीएमसी के पूर्व नेता और अभी आम जनता उन्नयन पार्टी के अध्यक्ष और विधायक हुमायूं कबीर कहते हैं कि जहाँगीर ख़ान ने गिरफ़्तारी से बचने के लिए ऐसा किया लेकिन चुनाव बाद, गिरफ़्तारी भी तय है.
हुमायूं कबीर कहते हैं, ''ऐसा नहीं है कि जहाँगीर ख़ान की मनमानी का अंदाज़ा टीएमसी को नहीं था. जहाँगीर ख़ान अभिषेक बनर्जी के वफ़ादार रहे हैं. डायमंड हार्बर में अभिषेक की जीत में जहाँगीर का बड़ा योगदान होता था. जहाँगीर दूसरी पार्टियों के मतदाताओं को धमकाते थे. वोट देने से रोकते थे. यह शिकायत कोई पहली बार नहीं आई है.''
अभिषेक के लिए झटका
हुमायूं कबीर ने बताया, ''शुभेंदु अधिकारी तो 2020 में बीजेपी में आए और टीएमसी में रहते हुए वह जहाँगीर की सारी हरकतों को जानते थे. अब शुभेंदु मुख्यमंत्री हैं तो जहाँगीर को भी अंदाज़ा हो गया था कि क्या होने वाला है. एफ़आईआर दर्ज होने के बाद ही संदेश चला गया था कि अब उनका क्या होने वाला है. मुझे हैरानी बस इस बात से हो रही है कि जहाँगीर ने ये करने में वक़्त थोड़ा ज़्यादा लिया.''
हुमायूं कबीर कहते हैं, ''जहाँगीर के मौसेरे भाई को गिरफ़्तार कर लिया गया है. फाल्टा सीट पर 70 फ़ीसदी हिन्दू मतदाता हैं. टीएमसी से कोई उम्मीदवार नहीं होने का फ़ायदा बीजेपी को सीधा मिलेगा. बीजेपी के लिए अब इस सीट पर कोई चुनौती नहीं है. इस सीट को जीतने का मतलब है कि अगले लोकसभा चुनाव में अभिषेक बनर्जी को डायमंड हार्बर को बचाना भी आसान नहीं होगा.''
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के एक प्रवक्ता से पूछा कि क्या पार्टी को इसका अंदाज़ा नहीं था?
इसके जवाब में उन्होंने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, ''चुनाव तक तो कोर्ट से प्रोटेक्शन मिल ही गया था. आप चुनाव लड़ रहे हैं तो इतना तो जिगरा रखना ही पड़ेगा. नामांकन के बाद इस तरह से बाहर होने का अंदाज़ा हमलोग को नहीं था.''
कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार सुमन भट्टाचार्य कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्ता की राजनीति करता है, उसके लिए विपक्ष की राजनीति करना मुश्किल हो जाता है.
भट्टाचार्य कहते हैं, ''जहाँगीर ख़ान के साथ भी ऐसा ही हुआ. शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद यह साबित कर दिया है कि जहाँगीर ख़ान जैसे लोग सत्ता के लिए टीएमसी की राजनीति में थे. इसीलिए जहाँगीर ख़ान चुनाव तक टिक नहीं पाए. यह अपने आप में विचित्र घटना है. सीपीएम भी सत्ता से बाहर रही लेकिन उसके साथ ऐसा कभी नहीं हुआ. टीएमसी को लेकर धारणा बन रही है कि आने वाले समय में पार्टी के भीतर टूट और बढ़ेगी. यह अभिषेक बनर्जी की राजनीति के लिए भी झटका है.''
भट्टाचार्य कहते हैं, ''ममता बनर्जी को विपक्ष की राजनीति आती है. वह इसीलिए जानी जाती हैं. अगर ममता की विपक्ष की राजनीति में टीएमसी आ जाती है तो उसके लिए राजनीति में वापसी आसान हो जाएगी. ममता की राजनीति का उभार सड़कों, थानों, कॉलेजों, अदालतों और लोगों के बीच हुआ है लेकिन अभिषेक बनर्जी को विपक्ष की राजनीति नहीं आती है. इसीलिए इनके सारे वफ़ादारों को सत्ता की राजनीति ही आती है. जहाँगीर के ख़िलाफ़ जितनी शिकायतें हैं, उनमें बहुत सच्चाई है. वोटरों को धमकी देने का मामला कोई नया नहीं है. ज़ाहिर है कि ये बात पार्टी भी जानती होगी.''
पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद टीएमसी के भीतर भी अभिषेक की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं. इसीलिए कुछ नेताओं को पार्टी से बाहर भी निकाल गया. ममता बनर्जी ने भी विधानसभा जिन विधायकों को नेता प्रतिपक्ष और चीफ़ व्हिप बनाया, उसके बारे में भी कहा जा रहा है कि अभिषेक बनर्जी की नहीं सुनी गई.
कोलकाता के ज़ेवियर्स कॉलेज में मास कम्युनिकेशन के प्रोफ़ेसर और बैटल ग्राउंड बंगाल के लेखक सायंतन घोष कहते हैं, ''ममता ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में शोभनदेब चट्टोपाध्याय के नेता प्रतिपक्ष बनाया. असीमा पात्रा और नयना बंद्योपाध्याय को डिप्टी लीडर्स जबकि चीफ व्हिप फ़िरहाद हकीम को बनाया. इस सूची में एक दिलचस्प और महीने राजनीतिक संदेश छिपा हुआ है. असीमा पात्रा को छोड़ दें तो बाक़ी सभी नेताओं को ममता बनर्जी के क़रीबी हैं.
अभिषेक गुट के लिए संदेश
"शोभनदेब चट्टोपाध्याय पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. फ़िरहाद हकीम लंबे समय से ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद राजनीतिक सहयोगियों में रहे हैं. वहीं नयना बंद्योपाध्याय, सुदीप बंद्योपाध्याय की पत्नी हैं, जो ममता बनर्जी के छात्र राजनीति के दिनों से उनके साथ जुड़े रहे हैं. इन नियुक्तियों को साथ रखकर देखें तो यह सूची उस गुट के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश मानी जा रही है, जिसे अभिषेक बनर्जी के क़रीबी के रूप में देखा जाता है.''
सायंतन घोष कहते हैं, ''जहाँगीर ख़ान को अभिषेक बनर्जी के दाएं हाथ के रूप में देखा जाता है. डायमंड हार्बर में जितने अंतर से अभिषेक को जीत मिलती थी, वो कोई सामान्य नहीं अंतर नहीं होता था. इसमें डराने धमकाने वाली राजनीति शामिल थी और जहाँगीर ख़ान की इसमें हिस्सेदारी होती थी. ममता की सरकार ने जहाँगीर ख़ान को वाई कैटिगरी सुरक्षा दे रखी थी.''
''शुभेंदु अधिकारी ने ये सुरक्षा वापस ले ली. ऐसे में जहाँगीर का डर गिरफ़्तारी का नहीं था बल्कि ख़ुद को सुरक्षित रखने का था. जब आपके पास सत्ता नहीं होती है तो आपका अतीत ही डराने के लिए काफ़ी होता है. मुझे लगता है कि अभिषेक बनर्जी की राजनीति की पोल भी खुल रही है.''
ममता बनाम अभिषेक
पश्चिम बंगाल में कथित घोटालों को लेकर कई जांचें हुईं, लेकिन इनमें से किसी में भी ममता बनर्जी सीधे तौर पर अभियुक्त नहीं बनीं. उनके ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई और न ही उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया. दूसरी तरफ़ अभिषेक बनर्जी के केंद्रीय एजेंसियां कई मामलों में पूछताछ कर चुकी हैं. ममता के बाद अभिषेक बनर्जी को ही पार्टी का उत्तराधिकार माना जाता है.
ममता के ख़िलाफ़ किसी भी तरह की जाँच नहीं होने को लेकर पश्चिम बंगाल की वामपंथी पार्टियां बीजेपी से मिलीभगत का भी आरोप लगाती रही हैं. हालांकि बंगाल की राजनीति में यह धारणा कभी मज़बूत हो नहीं पाई.
ममता बनर्जी अक्सर राजनीति में व्यक्तिगत शिकायतों को सार्वजनिक मुद्दा बनाने में कामयाब रहती हैं. 1990 और 2000 के शुरुआती वर्षों में उन्होंने वाम मोर्चा सरकार को ग़रीबों के प्रति असंवेदनशील और विरोध को दबाने वाली हिंसक सत्ता के रूप में लगातार पेश किया. यह नैरेटिव आख़िरकार उन्हें 2011 में सत्ता तक लाने में कामयाब रहा.
अब टीएमसी विपक्ष में है और पश्चिम बंगाल में विपक्ष के लिए राजनीति आसान नहीं होती है. ममता बनर्जी ने इस बार के चुनाव में बंगाली अस्मिता की राजनीति को हवा देने की कोशिश की थी लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.