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स्तन कैंसर: कारण, इलाज और दोबारा होने की वजह, जानिए हर ज़रूरी सवाल का जवाब
- Author, प्रियंका धीमान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
दुनिया भर में कई महिलाएँ स्तन कैंसर से जूझ रही हैं.
यह एक ऐसी बीमारी है, जो युवा महिलाओं से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक, सभी को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रही है.
स्तन कैंसर और उसके इलाज को लेकर लोगों में अभी भी कई ग़लत धारणाएँ और भय मौजूद हैं.
स्तन कैंसर की रोकथाम और इलाज संभव है, लेकिन इसके लिए सटीक जानकारी होना, लक्षणों को पहचानना और इसकी रोकथाम के तरीक़े जानना बहुत ज़रूरी है.
इस रिपोर्ट में हम स्तन कैंसर से जुड़े हर ज़रूरी सवाल का जवाब देने की कोशिश करेंगे.
डॉ. राजिंदर कौर स्तन कैंसर सर्जन और मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, वैशाली (ग़ाज़ियाबाद) में डायरेक्टर हैं. हमने उनसे इस विषय पर बातचीत की है.
अगर किसी महिला को स्तन कैंसर है, तो क्या हर मामले में स्तन को हटाना ज़रूरी है? या इसका इलाज स्तन को हटाए बिना भी संभव है?
डॉ. राजिंदर कौर: स्तन कैंसर का मतलब स्तन को हटाना नहीं है. आजकल हम ऑनकोप्लास्टिक ब्रेस्ट कंजर्विंग सर्जरी नाम की एक आधुनिक सर्जरी करते हैं. जब मरीज़ शुरुआती अवस्था में हमारे पास आता है, तो हम केवल गाँठ को हटाते हैं और स्तन के बाक़ी हिस्से को उसी आकार में लाने की कोशिश करते हैं.
अगर किसी महिला के स्तन का आकार बड़ा भी हो, तो हम उसका आकार कम करके उसे सही आकार देने की कोशिश करते हैं और यह संभव है.
क्या पुरुषों को भी हो सकता है स्तन कैंसर?
डॉ. राजिंदर कौर: स्तन कैंसर सिर्फ़ महिलाओं को ही नहीं, पुरुषों को भी हो सकता है. हालाँकि इसकी संभावना बहुत कम होती है. अगर महिलाओं में यह 100 मामलों में होता है, तो पुरुषों में केवल एक मामला सामने आता है.
दरअसल पुरुषों में भी निप्पल के नीचे स्तन टिश्यू मौजूद होते हैं, जहाँ कैंसर पनप सकता है. इसके लक्षण भी महिलाओं जैसे ही होते हैं, जैसे स्तन में गाँठ, निप्पल से पानी आना या निप्पल का अंदर की ओर धँस जाना.
स्तन कैंसर के लक्षण क्या हैं?
डॉ. राजिंदर कौर: स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद ज़रूरी है. अगर छाती में कोई गाँठ हो जो दर्द न करे, निप्पल से पानी या कोई तरल पदार्थ निकले, निप्पल अंदर की तरफ धँस जाए, छाती की त्वचा सख़्त या लाल हो जाए, या छाती के आकार में कोई बदलाव नज़र आए. ये सभी स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षण हैं.
स्तन कैंसर किस कारण से होता है?
डॉ. राजिंदर कौर: कुछ आदतें और शारीरिक बदलाव स्तन कैंसर का ख़तरा बढ़ा सकते हैं. कम उम्र में पीरियड आना, मोटापा, देर से पीरियड बंद होना, बच्चे न होना या बच्चे को दूध न पिलाना, बिल्कुल कसरत न करना, शराब, सिगरेट या तंबाकू की लत.
ये सब ख़तरे की घंटी हैं. इसके अलावा अगर परिवार में पहले किसी को स्तन कैंसर हो चुका है, तो भी ख़तरा बढ़ जाता है. जब ये सारी वजहें एक साथ हों, तो स्तन कैंसर होने की आशंका काफ़ी बढ़ जाती है.
इससे बचने के लिए जीवनशैली में क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
डॉ. राजिंदर कौर: अगर शरीर में मोटापा है तो उसे कम करने की कोशिश करें. ख़ासकर पीरियड बंद होने के बाद पेट के आसपास चर्बी न जमने दें.
30 साल की उम्र से पहले बच्चा होना फ़ायदेमंद माना जाता है और बच्चे को कम से कम एक साल तक अपना दूध ज़रूर पिलाएँ. इसके साथ ही खाने-पीने का ध्यान रखें और रोज़ाना थोड़ी कसरत ज़रूर करें. ये छोटी-छोटी आदतें स्तन कैंसर के ख़तरे को काफ़ी हद तक कम कर सकती हैं.
कैसे पता लगाएँ?
कैंसर के ख़तरे का पता लगाने के लिए कौन-कौन से नियमित परीक्षण किए जा सकते हैं?
डॉ. राजिंदर कौर: 20 साल की उम्र के बाद हर महिला को महीने में एक बार ख़ुद अपनी जाँच करनी चाहिए. इससे आपको अपने शरीर की सामान्य स्थिति का पता रहेगा और अगर कभी कुछ अलग या असामान्य लगे तो आप तुरंत पहचान सकती हैं.
जितनी जल्दी बदलाव पकड़ में आएगा, उतना ही इलाज आसान होगा. इसलिए बिना देर किए डॉक्टर से मिलें.
दूसरा तरीका है साल में एक बार डॉक्टर से जाँच करवाना. इसे क्लिनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन कहते हैं. इसमें डॉक्टर ख़ुद हाथ से जाँच करके बता सकते हैं कि सब कुछ ठीक है या नहीं.
तीसरा और सबसे सटीक तरीक़ा है मैमोग्राफी, यानी छाती का एक्स-रे.
यह जाँच इतनी बारीक होती है कि छोटी से छोटी गाँठ भी पकड़ में आ जाती है.
शोध बताते हैं कि 40 साल की उम्र के बाद अगर हर साल मैमोग्राम करवाया जाए, तो स्तन कैंसर का ख़तरा 40 प्रतिशत तक कम हो सकता है.
क्या जिन महिलाओं ने कभी स्तनपान नहीं कराया है, उन्हें स्तन कैंसर का ख़तरा अधिक होता है?
डॉ. राजिंदर कौर: बच्चे को अपना दूध पिलाना स्तन कैंसर से बचाव का एक कारगर तरीक़ा है.
जो महिलाएँ एक साल तक बच्चे को दूध पिलाती हैं, उनमें कैंसर का ख़तरा 2 से 4 प्रतिशत तक कम हो जाता है. महिलाएँ जितने लंबे समय तक दूध पिलाएँ, उतना ही फ़ायदा होता है.
मसलन अगर कोई महिला दो साल तक दूध पिलाती है तो यह ख़तरा 8 से 12 प्रतिशत तक घट जाता है. दरअसल दूध पिलाने के दौरान शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन कम सक्रिय रहता है, जिससे छाती की कोशिकाएँ जल्दी परिपक्व होती हैं और कैंसर का ख़तरा कम हो जाता है.
किस स्टेज तक स्तन कैंसर का इलाज संभव है?
स्तन कैंसर की उस स्टेज के बारे में बताएँ जिस पर इसका इलाज संभव है?
डॉ. राजिंदर कौर: स्तन कैंसर का इलाज जितनी जल्दी शुरू हो, उतना बेहतर होता है. स्टेज-1 और स्टेज-2 में 90 से 95 प्रतिशत मरीज़ ठीक हो सकते हैं. इसमें पहले ऑपरेशन, फिर कीमोथेरेपी और उसके बाद रेडिएशन थेरेपी दी जाती है.
स्टेज-3 में कैंसर थोड़ा फैल चुका होता है. इसलिए पहले कीमोथेरेपी दी जाती है ताकि गाँठ छोटी हो जाए और ऑपरेशन आसान हो सके, फिर बाक़ी इलाज किया जाता है.
स्टेज-4 में कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों तक पहुँच जाता है. ऐसे में टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी से मरीज़ की ज़िंदगी बेहतर और लंबी बनाने की कोशिश की जाती है. अच्छी बात यह है कि भारत में इन सभी आधुनिक इलाजों की सुविधा उपलब्ध है.
क्या कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है?
डॉ. राजिंदर कौर: स्तन कैंसर किसी भी उम्र में हो सकता है. एक बार 19 साल की एक लड़की अपनी माँ के साथ मेरे पास आई. उसके स्तन पर ट्यूमर था और उसमें से ख़ून और पानी निकल रहा था. जब मैंने जाँच की, तो रिपोर्ट में स्तन कैंसर की पुष्टि हुई.
जब मैंने मां से पूछा कि इतनी देर क्यों की, तो उन्होंने कहा, "हमें सपने में भी नहीं लगा था कि 19 साल की बच्ची की छाती की छोटी सी गाँठ कैंसर हो सकती है."
बस यही सोचकर पाँच-छह महीने निकल गए और गाँठ कैंसर में बदल गई. जब तक लड़की डॉक्टर के पास पहुँची, कैंसर पूरे शरीर में फैल चुका था और महीनों इलाज के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सका. यह दुखद कहानी एक ही सबक देती है कि देर न करें, गाँठ दिखे तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ.
क्या कैंसर के इलाज के कोई दुष्प्रभाव होते हैं?
डॉ. राजिंदर कौर: कैंसर के इलाज के दुष्प्रभाव होते हैं, लेकिन इलाज ख़त्म होने के बाद ये दुष्प्रभाव भी ख़त्म हो जाते हैं. महिलाओं में होने वाला मुख्य दुष्प्रभाव बालों का झड़ना है, यहाँ तक कि भौंहों के बाल भी झड़ जाते हैं.
इलाज के दौरान मरीज़ के स्तन को निकालना पड़ता है, जिससे मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत बदलाव आते हैं, लेकिन इलाज पूरा होते ही मरीज़ ठीक हो जाता है. सिर और भौंहों के बाल फिर से उग आते हैं. हम स्तन को पहले के आकार में ही दोबारा लगा देते हैं.
परिवार के पुरुषों को क्या भूमिका निभानी चाहिए?
क्या आयुर्वेदिक इलाज से कैंसर को ठीक किया जा सकता है?
डॉ. राजिंदर कौर: आयुर्वेद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मददगार हो सकता है, लेकिन यह कैंसर का इलाज नहीं है. कई बार मरीज़ को लगता है कि आयुर्वेदिक दवाओं से कैंसर ठीक हो रहा है, जबकि असल में कैंसर अंदर ही अंदर बढ़ता रहता है जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
इसके नतीजे बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं. इसलिए आयुर्वेद को सहायक के रूप में लें, लेकिन कैंसर के पक्के इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह पर ही भरोसा करें.
स्तन कैंसर से ठीक होने के बाद क्या किसी मरीज़ को दोबारा कैंसर हो सकता है?
डॉ. राजिंदर कौर: कुछ मामलों में स्तन कैंसर ठीक होने के बाद दोबारा हो सकता है. ऐसा उन लोगों में अधिक होने की संभावना होती है जिन्हें शुरुआत में ही गंभीर बीमारी हो या जिन्होंने नियमित इलाज न कराया हो और बीच में ही इलाज छोड़ दिया हो.
अगर परिवार की किसी महिला को स्तन कैंसर हो जाता है, तो उस परिवार के पुरुषों को क्या भूमिका निभानी चाहिए?
डॉ. राजिंदर कौर: कैंसर सिर्फ़ एक महिला की लड़ाई नहीं है. यह पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी है. इस समय उस महिला को भावनात्मक और मानसिक सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है.
इस दौरान महिला बहुत डरी हुई महसूस करती है और उसके मन में नकारात्मक विचार आते हैं. कई महिलाओं को नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती और रोने का मन करता है.
इस समय उसे सबसे ज़्यादा भावनात्मक सहारे की ज़रूरत होती है. ऐसे में उसका साथी ही सबसे बड़ा सहारा बन सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.