ख़ुदकुशी के आंकड़ों में शादीशुदा लोगों की संख्या क्यों बढ़ा रही है चिंता?

आत्महत्या के कुल मामलों में पुरुष ज्यादा हैं लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि महिलाओं की मानसिक पीड़ा अलग तरह से दिखती है. (प्रतीकात्मक फोटो)

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इमेज कैप्शन, आत्महत्या के कुल मामलों में पुरुष ज़्यादा हैं लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि महिलाओं की मानसिक पीड़ा अलग तरह से दिखती है. (प्रतीकात्मक फ़ोटो)
    • Author, मृदुलिका झा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

शादी को लंबे समय से सामाजिक और पारिवारिक स्थिरता से जोड़ा जाता रहा. लेकिन हाल के आंकड़े बताते हैं कि इसी स्थिरता को पाने का दबाव अब कई लोगों के लिए मानसिक तनाव की वजह भी बन रहा है.

यहां तक कि कुछ मामलों में लोग आत्महत्या जैसे क़दम उठाने को मजबूर हो रहे हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में इसका ज़िक्र है.

एनसीआरबी की रिपोर्ट 'एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024' के मुताबिक़, देश में आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह अब भी पारिवारिक समस्याएं हैं.

साल 2024 में दर्ज 1.70 लाख से ज़्यादा आत्महत्या के मामलों में एक-तिहाई से अधिक मामलों के पीछे यही कारण दर्ज किया गया. इसके बाद लंबी या गंभीर बीमारी, ड्रग एडिक्शन और शादी से जुड़े तनाव जैसी वजहें सामने आईं.

(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)

एनसीआरबी की रिपोर्ट में मैरिज रिलेटेड इश्यूज़ को अलग श्रेणी में रखा गया है. इसके भीतर शादी तय न होना, दहेज से जुड़े विवाद, विवाहेतर रिश्ते, तलाक़ और दूसरे वैवाहिक तनाव जैसी वजहें शामिल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़, 18 से 30 साल की उम्र के लोग इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित रहे, जबकि इसके बाद 30 से 45 साल के लोग आते हैं.

आंकड़ों में एक और पैटर्न भी दिखाई देता है. आत्महत्या करने वालों में बड़ी संख्या शादीशुदा लोगों की थी. रिपोर्ट के अनुसार, कुल ख़ुदकुशी करने वालों में 67.5 प्रतिशत लोग विवाहित थे.

क्या कहता है डेटा?

आपसी समझ की कमी या रिश्तों में पैदा होने वाला अविश्वास शादी में तनाव का प्रमुख कारण है. (प्रतीकात्मक फोटो)

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बता दें कि हर एक लाख आबादी पर दर्ज आत्महत्याओं को सुसाइड रेट कहा जाता है.

इस पैमाने पर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह सबसे ऊपर रहा, जहां प्रति एक लाख आबादी पर क़रीब 41 लोगों की मौत आत्महत्या से दर्ज की गई.

इसके बाद सिक्किम, केरल, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ का स्थान रहा. वहीं राजधानी दिल्ली में यह दर 13.2 रही.

संख्या के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा मामले पांच राज्यों, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल से आए, जो कुल मामलों का लगभग 49 फ़ीसदी है.

मैरिज रिलेटेड इश्यू क्या-क्या हैं, इसे लेकर बीबीसी ने दिल्ली स्थित एनसीआरबी के अधिकारियों से बात की.

असिस्टेंट डायरेक्टर पूनम के मुताबिक़, शादी से जुड़े तनाव, आपसी समझ की कमी या रिश्तों में पैदा होने वाले दूसरे विवाद इस श्रेणी में दर्ज किए जाते हैं.

हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि पूरी जानकारी उनके पास नहीं होती, क्योंकि एनसीआरबी राज्यों से मिले आंकड़ों को इकट्ठा करता है.

एक्सपर्ट्स का मानना है कि देश के ज़्यादातर हिस्सों में शादी को अब भी 'सेटल' होने के रूप में देखा जाता है. ऐसे में युवाओं पर कम उम्र से ही विवाह को लेकर उम्मीदें बना दी जाती हैं.

तय समय तक शादी न होने पर कई लोग ख़ुद को सामाजिक रूप से पीछे छूटा हुआ या दूसरों की नज़र में कमतर महसूस करने लगते हैं.

शादी के बाद होने वाले बदलाव को लेकर डर

रिचा होरा

दिल्ली में रिलेशनशिप काउंसलर रिचा होरा कहती हैं, "आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी समस्या रिश्तों और शादी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता है. कई युवाओं को समझ नहीं आता कि शादी उनके करियर, सपनों और निजी ज़िंदगी को किस तरफ ले जाएगी."

उनके मुताबिक़, "नई पीढ़ी खुशहाल रिश्ता तो चाहती है, लेकिन रिश्तों में बढ़ती अस्थिरता की वजह से उनमें डर और असुरक्षा बढ़ रही है. इससे कई लोग यह तय नहीं कर पाते कि उनके लिए क्या सही है. यह दबाव लड़कों और लड़कियों, दोनों में दिखाई देता है. कई लोग शादी को अपनी शर्तों पर चलाना चाहते हैं, जिससे टकराव बढ़ता है."

रिचा होरा कहती हैं, "हाल के दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां लंबे समय से साथ रह रहे अविवाहित कपल्स प्री-मैरिटल काउंसलिंग के लिए पहुंचे क्योंकि वे शादी को लेकर उलझन में थे."

उन्होंने एक ऐसे ही मामले का ज़िक्र किया, जहां लगभग आठ साल से रिश्ते में रह रहा एक जोड़ा मदद के लिए पहुंचा. दोनों का ही अतीत काफ़ी मुश्किलों से भरा था.

लड़की ने परिवार में ख़राब रिश्ते देख रखे थे. इसका असर ये हुआ कि वो भावनात्मक तौर पर ज़्यादा सुरक्षा चाहती थी. दूसरी तरफ, लड़के ने हिंसक माहौल देखा था. इससे उसके भीतर अलग मुश्किलें थीं.

भावनात्मक रूप से असुरक्षित लोग जब एक-दूसरे से मिले, तो उनके बीच जुड़ाव तो बना, लेकिन आपसी समझ नहीं बन सकी. धीरे-धीरे रिश्ते में तनाव और अविश्वास की स्थिति आई और लड़के की तरफ़ से विवाहेतर संबंध का मामला भी सामने आया.

कोर्ट में तनाव के मामले काफ़ी ज़्यादा

मनीष भदौरिया का कोट

बीबीसी ने इस बारे में दिल्ली हाई कोर्ट के सीनियर वकील मनीष भदौरिया से भी बात की. उनका कहना है कि इस पर अलग से कोई आधिकारिक डेटा तो नहीं है, लेकिन पारिवारिक और वैवाहिक विवादों से जुड़े मामले लगातार बढ़ रहे हैं.

वो कहते हैं, "लगभग हर फ़ैमिली लॉयर के पास मैट्रिमोनियल मामलों की बड़ी संख्या है. मेरे पास आने वाले ज़्यादातर केस भी शादी और रिश्तों से जुड़े विवादों के हैं."

"कई बार ऐसे मामले भी आते हैं जहां शादी पर भारी ख़र्च किया गया, लेकिन कुछ ही समय बाद मामला क़ानूनी विवाद तक पहुंच गया."

तलाक़ के बावजूद रिश्तों में तनाव को लेकर वो कहते हैं, "अलगाव हमेशा विवाद का अंत नहीं होता. गुज़ारा भत्ता, घरेलू हिंसा, दहेज प्रताड़ना या दूसरे आरोपों को लेकर क़ानूनी लड़ाई लंबे समय तक चल सकती है."

उनके मुताबिक़, कई मामलों में लोग लगातार टकराव झेलते रहते हैं, जिसका असर मानसिक स्थिति पर पड़ता है.

मनीष भदौरिया कहते हैं, "जीवनशैली और एक-दूसरे से उम्मीदों में फ़र्क भी रिश्तों में तनाव की बड़ी वजह बन रहा है. कई बार दोनों ज़िंदगी को अलग तरीक़े से जीना चाहते हैं. यही फ़र्क आगे चलकर अलगाव में बदल जाता है."

समाज बदलता है तो तनाव भी बढ़ता है

प्रोफ़ेसर रीमा भाटिया

आत्महत्या के कुल मामलों में पुरुष ज़्यादा हैं लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि महिलाओं की मानसिक पीड़ा अलग तरह से दिखती है.

मिरांडा हाउस कॉलेज में समाजशास्त्र की विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर रीमा भाटिया एक युवती का उदाहरण देते हुए बताती हैं कि उसने आईआईटी से पढ़ाई के बाद जर्मनी में काम शुरू कर दिया और सालों से वहीं है, लेकिन उसके लिए जो रिश्ते आते हैं, उसमें घरेलू कामों की ही उम्मीद की जा रही है.

प्रोफ़ेसर भाटिया कहती हैं, "हमारे यहां शादी अब भी यूनिवर्सल कंसेप्ट की तरह है. ज़्यादातर लोग शादी करते हैं. बहुत हद तक ये सफलता का पैमाना माना जाता है. लेकिन समस्या यह है कि शादी को लेकर पुरुषों और महिलाओं, दोनों की उम्मीदें अलग-अलग हैं."

"लड़कियां आगे निकल रही हैं, पढ़-लिखकर बाहर काम कर रही हैं. लेकिन शादी के बाद उनसे घरेलू उम्मीदें भी की जाती हैं. पुरुष उस तरह से कदमताल नहीं कर पा रहे."

फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम की किताब 'सुसाइड- ए स्टडी इन सोशियोलॉजी' का हवाला देते हुए प्रो. भाटिया कहती हैं, "जब भी समाज इवॉल्व होता है तो आत्महत्या जैसी घटनाएं बढ़ती ही हैं."

"यहां हो क्या रहा है कि महिलाएं बदल रही हैं, लेकिन कई पुरुष उनके साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे. इससे शादियों में तनाव बढ़ता जाता है. फ़िलहाल जो दिख रहा है, वो इसी इवॉल्यूशन का शुरुआती हिस्सा है. यही सबसे ज़्यादा उथल-पुथल वाला है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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