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देहरादून में टंकी पर चढ़कर क्या मांग कर रहे थे नर्सिंग अफ़सर, महिला कांग्रेस नेता ने जान देने की कोशिश की
- Author, वर्षा सिंह
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 8 मिनट
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उत्तराखंड में नर्सिंग अफ़सरों की भर्ती के लिए तीन आंदोलनकारियों के साथ महिला कांग्रेस की नेता दो दिन तक देहरादून में एक पानी की टंकी पर बैठी रहीं.
इससे पहले नर्सिंग एकता मंच के बैनर तले देहरादून में 156 दिन तक अनिश्चितकालीन धरना दिया गया था और ये आंदोलनकारी 22 दिन तक आमरण अनशन पर भी बैठे रहे थे.
लेकिन इनका कहना है कि सरकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हो रही थी. इसलिए 11 मई को तीन नर्सिंग आंदोलनकारी देहरादून के परेड ग्राउंड में बनी एक पानी की टंकी पर चढ़ गए. उनके साथ एक महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष भी थीं.
13 मई को टंकी पर चढ़ी एक आंदोलनकारी ने जान देने की कोशिश की.
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इस सबके बाद आखिर आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग से जुड़ा प्रस्ताव शासन को भेजा गया.
फिर नर्सिंग ऑफिसर कविता चौहान और उत्तराखंड महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष ज्योति रौतेला को 13 मई को देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती करवाया गया.
इस मामले में शामिल ये आंदोलनकारी और अन्य नर्सिंग ग्रेजुएट क्या सोच रहे हैं? उनकी क्या मांगें हैं? आइए जानते हैं
'आईसीयू में पहुंच गए लेकिन किसी ने नहीं सुनी'
कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती नर्सिंग ऑफ़िसर कविता चौहान कमज़ोरी महसूस कर रही थीं. वह नर्सिंग भर्ती प्रक्रिया में फेरबदल के विरोध में 19 अप्रैल से आमरण अनशन कर रही थीं.
सर्दियों में शुरू हुआ धरना गर्मियों में प्रवेश कर गया. कविता बताती हैं, "हम नर्सिंग एकता मंच के बैनर तले 5 दिसंबर से धरनास्थल पर धरना दे रहे थे. राज्यभर से बड़ी संख्या में नर्सिंग अभ्यर्थी हमारे धरने में शामिल हो रहे थे. हम स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से मिले. पूर्व स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर धन सिंह रावत और नए स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल से मिले. हमने सड़क पर रैलियां निकाली. मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच किया. किसी ने हमारी सुध नहीं ली".
19 अप्रैल से नर्सिंग अभ्यर्थियों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया लेकिन फिर भी सरकार ने उनकी नहीं सुनी.
कविता बताती हैं, "आमरण अनशन के दौरान हालत बिगड़ने पर 6 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. हम आईसीयू में भर्ती हुए. फिर भी कोई प्रशासनिक अधिकारी हमारी बात सुनने नहीं आया. 11 मई को अनशन ख़त्म कर हमने पानी की टंकी पर चढ़ने का फ़ैसला लिया."
कविता और तीन अन्य नर्सिंग ऑफिसर धर्मेंद्र, आनंद और विनोद पानी की टंकी पर चढ़ गए. उनके साथ उनके आंदोलन को समर्थन दे रहीं उत्तराखंड महिला कांग्रेस की अध्यक्ष ज्योति रौतैला भी टंकी पर चढ़ीं.
कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती ज्योति के शरीर पर जख्म हैं. वह दर्द में हैं. उन्हें अहसास है कि जान देने की कोशिश करने का उनका फ़ैसला सही नहीं था.
भावुक होते हुए वह कहती हैं, "किसी को भी ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए. मुझे तकलीफ़ है कि शासन-प्रशासन ने मेरे इस कदम के बाद ही नर्सिंग अभ्यर्थियों की मांगों पर गौर किया".
वह कहती हैं, "हमें पानी की टंकी पर 60 घंटे बीत चुके थे. हम कड़ी धूप और रात को मच्छरों के बीच वहां रहे. हम खा नहीं रहे थे, पानी घूंट-घूंटकर पी रहे थे. क्योंकि वहां टॉयलेट नहीं जा सकते थे. मैं स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल और ज़िला प्रशासन को लगातार फ़ोन कर रही थी."
"स्वास्थ्य सचिव, जिलाधिकारी, सिटी मजिस्ट्रेट, एसपी सिटी सभी को फ़ोन किया लेकिन कोई हमारा फ़ोन नहीं उठा रहा था. मुझे लगा कि सरकार का आंदोलनकारियों के प्रति बहुत कठोर व्यवहार है. फिर हमने 12 मई को शाम 5 बजे तक का अल्टीमेटम दिया कि अगर कोई हमसे बात करने नहीं आया तो हम कड़ा कदम उठाएंगे."
ज्योति कहती हैं, "सरकार के कठोर रवैये से निराश होकर मैंने जान देने की कोशिश की. इसके बाद वे हरकत में आए. चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की महानिदेशक डॉक्टर सुनीता टम्टा हमारी मांगों का प्रस्ताव आगे बढ़ाने की तैयारी करने लगीं. मैंने बहुत दर्द के बावजूद पूरी रात पानी की टंकी पर गुजारी. मेरा दर्द बर्दाश्त के बाहर हो रहा था. लेकिन जब तक उन्होंने हमारी मांग के हिसाब से भर्ती का प्रस्ताव शासन को नहीं भेजा, हम टंकी से नीचे नहीं उतरे".
नर्सिंग अभ्यर्थियों की मांग क्या है?
अस्पताल में भर्ती कविता और ज्योति को देखने के लिए नर्सिंग अभ्यर्थी लगातार पहुंच रहे थे. अस्पताल का नर्सिंग स्टाफ भी उनसे हमदर्दी जता रहा था और उनका समर्थन कर रहा था.
देहरादून के एक निजी अस्पताल में नर्स की नौकरी कर रही सरिता जोशी 2014 की नर्सिंग ग्रेजुएट हैं. नर्सिंग एकता मंच के बैनर तले तकरीबन 160 दिन चले इस आंदोलन में वह शामिल रहीं.
वह बताती हैं, "करीब 12 साल बाद साल 2020 में नर्सिंग के लगभग तीन हज़ार पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे गए, जिसमें लिखित परीक्षा का प्रावधान था. हम परीक्षा के लिए तैयार थे. लेकिन उस दौरान बहुत से नर्सिंग अभ्यर्थी परीक्षा प्रक्रिया का विरोध कर रहे थे क्योंकि इतने साल में पढ़ाई छूट जाती है. वह वरिष्ठता के आधार पर वर्षवार भर्ती की मांग कर रहे थे."
यानी पहले पासआउट हुए अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देकर पहले नियुक्ति दी जाए.
सरिता जोशी का कहना है, "उस समय नर्सिंग अभ्यर्थियों की मांगों को सरकार ने मान लिया और एक दिन पहले परीक्षा रद्द कर दी गई. हमें कहा गया कि हमारी नियुक्ति भी वरिष्ठता के आधार पर होगी. 2020 की भर्तियों को पूरा करने में ही सरकार को पांच साल लग गए. इस दौरान कई अभ्यर्थी 42 साल की उम्र पात्रता सीमा को पार कर गए. वहीं, बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों का चयन भी हुआ. इससे राज्य के नर्सिंग युवाओं का नुकसान हुआ."
साल 2025 के नवंबर और दिसंबर में उत्तराखंड चिकित्सा सेवा बोर्ड ने नर्सिंग पदों के लिए दो अलग-अलग विज्ञापन जारी किए. एक में 587 पदों के लिए आवेदन मांगे गए, जबकि दूसरी भर्ती में 103 बैकलॉग पदों के लिए प्रक्रिया शुरू की गई. दोनों भर्तियों में चयन का आधार लिखित परीक्षा रखा गया.
सरिता कहती हैं, "जब हम परीक्षा के लिए तैयार थे तो सरकार ने परीक्षा रद्द कर दी. हमने सोचा वरिष्ठता में हमारा नंबर आएगा तो उसमें हमारा नाम नहीं आया. जबकि हमारे बैच के कई साथियों का उसी प्रक्रिया में चयन हो गया. फिर नई नौकरियां परीक्षा आधारित निकाल दीं. अगर आपकी एक ही नीति रहती तो हमें कोई परेशानी नहीं थी. आपकी नीतियों में बदलाव से हमारा भविष्य ख़तरे में है."
"पांच महीने किसी आंदोलन को चलाना आसान नहीं होता. मैं गृहणी हूं. अपना घर और बच्चे संभालती हूं. मैं एक निजी अस्पताल में डायलिसिस विभाग में नर्स हूं. मरीजों की सेवा करती हूं. इसके बाद धरना और आमरण अनशन भी कर रही. मंत्री और अधिकारियों के चक्कर भी लगाती रही. हम सबकी मन:स्थिति खराब हो गई थी. इसीलिए हम आत्मदाह जैसे कदम उठाने को विवश हुए".
आंदोलन के लिए कई अभ्यर्थियों ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी. नर्सिंग एकता मंच के अध्यक्ष नवल पुंडीर भी इनमें से एक हैं.
वह बताते हैं कि फ़िलहाल यह आंदोलन स्थगित किया गया है और सरकार को एक महीने का समय दिया है. "हमारी सरकार से मांग है कि वर्षवार वरिष्ठता के आधार पर भर्ती कीजिए. जो अभ्यर्थी तय उम्र सीमा पार कर गए हैं, उन्हें एक और अवसर दीजिए."
अब स्वास्थ्य महानिदेशक डॉक्टर सुनीता टम्टा ने नर्सिंग अधिकारियों की मौजूदा भर्ती को वर्षवार आधार पर पूर्ण करने का प्रस्ताव चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग को भेजा है.
बीबीसी हिन्दी से बातचीत में डॉक्टर सुनीता टम्टा कहती हैं, "यह नीतिगत मामला है. हमने शासन को प्रस्ताव भेज दिया है. स्वास्थ्य मंत्री ही इस पर अंतिम निर्णय लेंगे."
डॉक्टर टम्टा बताती हैं, "इस समय नर्सिंग से जुड़े 500 से अधिक पद खाली हैं. वर्ष 2020 में तकरीबन तीन हज़ार पदों पर भर्ती की गई थी. हम नर्सिंग में नियुक्तियों के लिए हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर नीति लाएंगे. इसमें 70 प्रतिशत पद परीक्षा के ज़रिए भरे जाएंगे और शेष 30 प्रतिशत वरिष्ठता के आधार पर."
'सरकारी प्रक्रिया में देरी से नौकरी की उम्र पार न हो जाए'
इस ख़बर को लिखे जाने के दौरान स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल और स्वास्थ्य सचिव सचिन कुर्वे से फ़ोन पर संपर्क का लगातार प्रयास किया गया लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी. उनसे बात होने की स्थिति में इसे अपडेट किया जाएगा. हालांकि मीडिया में स्वास्थ्य मंत्री ने अभ्यर्थियों की मांगों पर बैठक कर विवेचना करने बात कही.
कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती अपनी साथी को देखने आईं सीरा बधानी इसी अस्पताल में कॉन्ट्रैक्ट पर नर्स के पद पर कार्यरत हैं. वह आमरण अनशन करने वाले 22 अभ्यर्थियों में से एक थीं. नवें दिन उनकी तबियत बिगड़ी तो इसी अस्पताल के आईसीयू में 6 दिन भर्ती रहना पड़ा.
वह बताती हैं, "मुझे यूटीआई यानी मूत्र तंत्र में संक्रमण की शिकायत हो गई थी. इसकी वजह से हृदय संबंधी परेशानी और ब्लडप्रेशर भी कम हो गया था. "
सीरा 40 वर्ष की हो चुकी हैं और उन्हें डर है कि सरकारी प्रक्रिया में देरी से नौकरी की उम्र सीमा पार हो जाएगी. वह कहती हैं कि सरकारी नौकरी पाने का उनका यह आखिरी मौका है.
उन्होंने बताया, "साल 2020 में कोरोनाकाल में मुझे कोरोनेशन में कॉन्ट्रैक्ट पर नौकरी मिली थी. कोविड संक्रमण के नमूने लेने में मेरी ड्यूटी लगाई गई थी. तब मेरा एक महीने का बच्चा था. और हमें संक्रमण का डर था."
भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी 'पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे' की तिमाही रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 के अक्तूबर-दिसंबर तिमाही के बीच उत्तराखंड में बेरोज़गारी दर 8.5 प्रतिशत दर्ज की गई जो पूरे देश में सबसे ज्यादा थी. यह राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है.
भाकपा (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी कहते हैं, "स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों को 150 दिन से अधिक धरने पर बैठे रहना पड़ा. अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाना पड़ा. राज्य में हज़ारों सरकारी पद रिक्त हैं. यह रोज़गार देने के प्रति सरकार के रुख को दर्शाता है. उन्हें भर्ती प्रक्रिया से, इसके नियमों से, नियुक्ति में पारदर्शिता जैसे मामलों से कोई सरोकार नहीं है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.