फ़ेक न्यूज़ रोकने के सरकारी क़दम से सेंसरशिप की आशंकाएँ क्यों?

    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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साल 2021 में भारत में लागू किए गए आईटी नियम लगातार विवादों में रहे हैं.

जहाँ एक तरफ सरकार का कहना रहा है कि ये नियम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पारदर्शिता की कमी से निपटने और एक मज़बूत शिकायत निवारण व्यवस्था बनाने की मंशा से लाए गए हैं, वहीं सोशल मीडिया और न्यूज़ मीडिया कंपनियाँ इन नियमों को अभिव्यक्ति की आज़ादी को रोकने की एक कोशिश के रूप में देखती रहीं हैं.

इन नियमों के लागू होने के बाद से भारत के कई राज्यों की अदालतों में इन्हें क़ानूनी चुनौती दी जा चुकी है. बॉम्बे हाईकोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट ने इन नियमों की कुछ धाराओं पर आंशिक रूप से रोक भी लगाई. मद्रास हाई कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि ये नियम मीडिया से उसकी स्वतंत्रता छीन सकते हैं. इन नियमों के ख़िलाफ़ देश भर में दायर हुए मामलों को इकट्ठा कर आख़िरकार मामला अब सुप्रीम कोर्ट में आ गया है और अभी सुनवाई बाक़ी है.

ऐसे में भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने हाल ही में इन नियमों में जब एक नए संशोधन का प्रस्ताव रखा तो जो पहले से आशंका व्यक्त कर रहे थे, वे लोग और चिंतित हो गए.

17 जनवरी को जारी किए गए इस प्रस्ताव में कहा गया कि अगर किसी भी सोशल मीडिया कॉन्टेंट को केंद्र सरकार के प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) की फैक्ट चेक यूनिट फ़र्ज़ी या झूठा बताती है तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उस कॉन्टेंट को हटाना होगा. प्रस्ताव में कहा गया कि केंद्र सरकार की कोई भी अधिकृत एजेंसी किसी सोशल मीडिया कॉन्टेंट को फ़र्ज़ी बताएगी तो उस सामग्री को हटाना होगा.

17 जनवरी को रखे गए प्रस्ताव पर आम जनता की प्रतिक्रिया मांगने की आख़िरी तारीख़ 25 जनवरी तय की गई थी, इस मसले पर मचे बवाल के बाद अब इस तारीख़ को बढ़ाकर 20 फरवरी कर दिया गया है. सिर्फ़ एक सप्ताह का समय दिए जाने को भी कई लोगों ने सरकार की जल्दबाज़ी का संकेत क़रार दिया था.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया और न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (एनबीडीए) जैसी संस्थाएं इस प्रस्तावित संशोधन पर अपनी चिंता जता चुकी हैं.

एनबीडीए ने कहा है, "ये संशोधन लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का गला घोंटने का काम करेगा और इसे वापस लिया जाना चाहिए."

एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने भी इस संशोधन को हटाने की मांग की है.

सोशल मीडिया कॉन्टेंट पर सरकारी हस्तक्षेप

भारत सरकार के हस्तक्षेप पर कितना सोशल मीडिया कॉन्टेंट ब्लॉक किया गया या हटाया गया, इस बारे बहुत ही सीमित जानकारी उपलब्ध है क्योंकि इस तरह के आदेश सार्वजानिक नहीं किए जाते.

लेकिन ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हर महीने एक ट्रांसपेरेंसी या पारदर्शिता रिपोर्ट जारी करते हैं जिससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इन प्लेटफॉर्म्स से कॉन्टेंट हटाने की कितनी मांगे सरकार की तरफ से आईं.

ट्विटर की जुलाई से दिसंबर 2021 तक की ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट में कहा गया कि कॉन्टेंट हटाने की सबसे ज़्यादा मांग करने वाले देशों में भारत का पाँचवाँ स्थान था. पहले से चौथे स्थान पर जापान, रूस, साउथ कोरिया और तुर्की थे.

इसी तरह जनवरी और जून 2022 के बीच भारत सरकार ने फेसबुक से डाटा को लेकर 55,497 अनुरोध किए जिसमें से 51,602 अनुरोध क़ानूनी प्रक्रिया से जुड़े थे और 3,895 आपातकालीन अनुरोध थे.

गूगल की ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2011 से लेकर अब तक सरकार की तरफ से कॉन्टेंट हटाने के 15,657 अनुरोध किए गए जिनमें 1,08,186 आइटम्स को नामित किया गया.

लोकतंत्र, राजनीतिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर रिसर्च करने वाली अमेरिकी संस्था फ्रीडम हाउस के मुताबिक भारत में सूचनाओं को ब्लॉक करने के सरकार या अदालतों के आदेशों की संख्या बढ़ रही है.

फ्रीडम हाउस के मुताबिक़ फरवरी 2022 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भारत की संसद में बताया कि साल 2021 में 6,069 अकाउंट, वेबसाइट और यूआरएल सरकारी आदेशों के बाद प्रतिबंधित किए गए. इसी तरह भारत सरकार ने 2018 और 2020 के बीच 16,283 वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसमें से साल 2020 में 9,849 वेबसाइटों पर लगा प्रतिबंध शामिल था.

इन प्रतिबंधों के लिए जो वजहें बताई गईं उनमें 'भारत विरोधी भावना को भड़काने', 'सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने', 'राज्य की सुरक्षा और भारत की संप्रभुता और अखंडता के हित और रक्षा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश' करना शामिल थीं.

'ये नियम सेंसरशिप को बढ़ावा देते हैं'

इस पृष्ठभूमि में सरकार का आईटी नियमों को संशोधित करने का प्रस्ताव और ज़्यादा चिंताजनक बन गया है. एक्सेस नाउ 2009 में स्थापित एक संस्था है जो दुनिया भर के लोगों के डिजिटल नागरिक अधिकारों का बचाव और विस्तार करने की दिशा में काम करती है.

एक्सेस नाउ के वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय परामर्शदाता और एशिया प्रशांत नीति निदेशक रमन चीमा कहते हैं कि आईटी नियमों में प्रस्तावित संशोधनों से वे बहुत चिंतित हैं.

वे कहते हैं, "हमने बार-बार कहा है कि 2021 के आईटी नियम पहले से ही ख़तरनाक़ रूप से व्यापक हैं और भारत के संविधान और कानूनी ढांचे के तहत असंवैधानिक हैं और मानवाधिकारों को सीधे नुकसान पहुंचाते हैं क्योंकि वे सेंसरशिप को बढ़ावा देते हैं."

चीमा के मुताबिक इन आईटी नियमों पर भारतीय संसद में चर्चा की जानी चाहिए थी और इन्हें एक नए क़ानून के तौर पर पारित किया जाना चाहिए था लेकिन अगर ऐसा होता भी तो भी ये क़ानून मानवाधिकारों के मानकों पर खरा नहीं उतरता.

'अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाने की कोशिश'

साइबर क़ानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं कि भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून का मक़सद कभी भी लोगों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाना नहीं था लेकिन अब एक परोक्ष तरीक़े से इस आज़ादी पर अंकुश लगाने की कोशिश हो रही है.

वे कहते हैं, "ये जो ड्रॉफ्ट रूल्स आए हैं ये साबित करते हैं कि अब हर इंटरमीडिएरी न केवल ख़ुद क़दम उठाएगा बल्कि साथ ही साथ ये भी सुनिश्चित करेगा की वो अपने उपभोक्ताओं को विवश कर सके कि वो कोई ऐसी चीज़ पोस्ट न करें जिसे पीआईबी फैक्ट चेक यूनिट या किसी और सरकारी संस्था ने फ़र्ज़ी घोषित कर दिया है. ये कहीं न कहीं सरकार का सीधा नियंत्रण बनाने की दिशा में उठाया गया क़दम है."

दुग्गल के मुताबिक अगर इस तरह के नए नियम आए भी तो उन्हें अदालत में चुनौती ज़रूर दी जाएगी. "हो सकता है अलग-अलग जनहित याचिकाएं भी सामने आ जाएँ जो इन नियमों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाएँगी".

फैक्ट-चेक और पीआईबी

सरकार के हालिया प्रस्ताव के मुताबिक किसी भी ऑनलाइन कॉन्टेंट को सच या झूठ घोषित करने की शक्तियां पीआईबी फैक्ट चेकिंग यूनिट के हाथ में दे दी जाएँगी. चिंता जताई जा रही है कि अगर ऐसा होता है तो सरकार का सोशल मीडिया पर नियंत्रण बढ़ने वाला है जिसका असर न्यूज़ मीडिया पर भी होगा.

लेकिन दूसरी तरफ ये बात भी रेखांकित की जा रही है कि फैक्ट-चेकिंग के मामले में पीआईबी फैक्ट चेक यूनिट का प्रदर्शन कई बार बहुत ख़राब रहा है और ऐसे कई प्रकरण हुए हैं जब पीआईबी के किए फैक्ट चेक को सरकारी एजेंसियों ने ही ग़लत बता दिया.

पवन दुग्गल कहते हैं कि पीआईबी का उद्देश्य सरकार की नीतियों के बारे में ज़्यादा जानकारी देना या प्रचार करना है और फैक्ट चेक करना उसका मूल काम नहीं है.

वे कहते हैं, "अगर आपको फैक्ट चेकिंग करवानी है तो आप कोई स्वतंत्र इंडस्ट्री बॉडी बनाइए जिसमें प्राइवेट सेक्टर भी हो, पब्लिक सेक्टर भी हो और जो समूचे तौर पर निर्णय ले कि क्या फेक न्यूज़ है और क्या नहीं."

दुग्गल के मुताबिक क्या फेक न्यूज़ है और क्या नहीं, ये फैसला लेने का अधिकार लोगों को या इंडस्ट्री को होना चाहिए. "सरकार केवल सहायता दे सकती है. लेकिन सरकार ख़ुद ही कह रही है कि मैं ही बताऊँगी कि क्या सही है और क्या नहीं, तो उससे लोगों के मौलिक अधिकार का हनन हो सकता है."

उनके मुताबिक अगर एक "प्रोपोगंडा एजेंसी को ही जज और ज्यूरी बना देंगे तो ये नैरेटिव को नियंत्रित करने की दिशा में एक क़दम होगा".

वे कहते हैं कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और लोग सरकार के विचारों से मतभेद भी रख सकते हैं और उनकी आलोचना भी कर सकते हैं. "लोगों पर ये थोपना कि जो सरकार कह रही है वही सच है वो शायद लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होगा".

रमन चीमा भी कहते हैं कि सबसे ज़रूरी बात यही है कि पीआईबी एक फैक्ट-चेकिंग अथॉरिटी नहीं है.वे कहते हैं, "दुनिया भर में फैक्ट चेकर्स को प्रमाणित करने वाले इंटरनेशनल फैक्ट चेकिंग नेटवर्क ने भी पीआईबी को फैक्ट-चेकर के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया है."

दुग्गल के मुताबिक पीआईबी सरकार की तरफ से फैक्ट-चेकिंग कर सकती है लेकिन ये ज़रूरी नहीं है कि सब लोग सरकारी दृष्टिकोण से सभी चीज़ों को देखें, या हर बार सरकार ही सही हो.

क्या है सरकार की मंशा?

ये सवाल लगातार उठ रहा है कि आईटी नियम लाने और उनमें अब नए संशोधन प्रस्तावित करने के पीछे सरकार की क्या मंशा है. रमन चीमा कहते हैं कि बावजूद इसके कि इन नियमों के कई हिस्सों को अदालतों में चुनौती दी गई है और कुछ हिस्सों पर अदालतों ने रोक भी लगा दी है, है, सरकार ने "समस्या का समाधान करने की बजाय उसमें इज़ाफ़ा ही किया है".

वे कहते हैं, "हमें नहीं लगता कि इन नियमों के उचित कानूनी आधार हैं. हम इन नियमों को गैर-कानूनी मानते हैं क्योंकि सरकार संसद में जाए बिना ऐसा नहीं कर सकती."

चीमा का मानना है कि इन नियमों के ज़रिए सरकार जो करना चाह रही है वो "आवश्यक, आनुपातिक और वैध" होने के क़ानूनी मानकों को पूरा नहीं करते. साथ ही, वे कहते हैं कि ये प्रावधान ज़रूरी नहीं हैं.

चीमा कहते हैं कि उन्हें नहीं लगता कि सरकार ने समस्या की सही पहचान की है, और न ही वो जानती है कि वो क्या ठीक करने की कोशिश कर रही है. उनके मुताबिक भारत में आईपीसी के तहत दुष्प्रचार पहले से ही एक अपराध है इसलिए ये साफ़ नहीं है कि सरकार दुष्प्रचार से जुड़ी किस समस्या का हल करने की कोशिश कर रही है.

वे कहते हैं, "हम नहीं जानते कि सरकार क्या ठीक करने की कोशिश कर रही है क्योंकि उन्होंने एक भी पेपर सामने नहीं रखा है जो साफ़ तौर पर इशारा करता हो कि समस्या के बारे में उनकी समझ क्या है और उन्हें क्यों लगता है कि ये नियम उस समस्या को ठीक कर देंगे. ये प्रस्ताव ऑनलाइन मीडिया को डराने और ख़ुद को ज़्यादा अधिकार देने की कोशिश लगती है."

बीबीसी डॉक्युमेंटरी पर प्रतिबं

हाल ही में भारत सरकार ने आईटी नियमों के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यूट्यूब और ट्विटर को बीबीसी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संबंधित डॉक्युमेंट्री के लिंक हटाने के आदेश दिए.

इस बात की जानकारी सूचना और प्रसारण मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार कंचन गुप्ता ने कुछ ट्वीट्स के ज़रिए साझा की. ग़ौरतलब है कि इस कार्रवाई के बारे में किसी भी सरकारी आदेश की प्रति या सूचना को सार्वजनिक नहीं किया गया.

आईटी नियमों की एक बड़ी आलोचना इनके क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी भी है.

सोशल मीडिया से डॉक्युमेंट्री का लिंक हटाने को लेकर कई लोग सुप्रीम कोर्ट में पहुँचे हैं जिनमें जाने-माने वकील प्रशांत भूषण और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुाआ मोइत्रा शामिल हैं.

रमन चीमा कहते है, "सरकार ऐसी सामग्री को हटाने के लिए आईटी नियमों का सीधे तौर पर दुरुपयोग कर रही है जो वैध हो सकती है और ऑनलाइन होनी चाहिए. वे उचित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं और गोपनीयता रख रहे हैं. दुनिया भर के प्रमुख लोकतंत्रों में भारत शायद इकलौता है जहां संघीय सरकार सीधे सैकड़ों लिंक की वेब सेंसरशिप का आदेश देती है और वह भी गुप्त तरीके से."

पवन दुग्गल के मुताबिक आज की तारीख़ में बुनियादी सच ये है कि किसी भी जानकारी को पूरी तरह से ब्लॉक नहीं किया जा सकता. वे कहते हैं, "आप अपने देश में ब्लॉक कर सकते हैं लेकिन इंटरनेट आज एक वैश्विक इकोसिस्टम है और सरकार चाहे कुछ भी दिशा निर्देश दे दे लेकिन इतनी सारी टेक्नोलॉजीज़ उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से आप उस प्रतिबंधित कॉन्टेंट को बड़ी आसानी से अपने घर बैठे देख सकते हैं."

रमन चीमा कहते हैं कि मौजूदा आईटी नियमों के दुरुपयोग और वेब सेंसरशिप आदेशों के हालिया विस्फोट को देखते ऐसा नहीं लगता कि ये बदलाव सही इरादे और भावना से किए जा रहे हैं. वे कहते हैं, "ये कुछ ऐसे बदलाव हैं जो 2024 में होने वाले आम चुनावों से पहले बचे वर्ष में स्वतंत्र प्रेस के संचालन को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किए जाएँगे."

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