क्रिकेट इतिहास में जिन पांच परीक्षणों की प्रयोगशाला था विश्वकप

    • Author, शुभोज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला, दिल्ली
  • प्रकाशित

साल 1975 में इंग्लैंड में आयोजित पहले क्रिकेट विश्वकप के आयोजन का मकसद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के खाली खजाने में कुछ रकम जुटाना था.

अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनी प्रूडेंशियल ने उस टूर्नामेंट के लिए एक लाख पाउंड के स्पांसरशिप की हामी भरी थी. सिर्फ इसी भरोसे पर आईसीसी ने महज 18 एकदिवसीय मैच खेले जाने के बाद ही उस प्रारूप में विश्वकप के आयोजन का फैसला कर लिया था.

उस समय तक इंग्लैंड भले करीब दर्जन भर वनडे खेल चुका था, भारत, पाकिस्तान या वेस्टइंडीज जैसी टीमों ने इस प्रारूप में दो या तीन से ज्यादा मैच नहीं खेले थे. ऑस्ट्रेलिया तो यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं था कि वनडे क्रिकेट का कोई भविष्य भी है.

हालांकि इसके बहुत बाद में टी20 या टेस्ट विश्वकप या विश्व चैंपियनशिप शुरू होने के बावजूद आज भी वनडे विश्वकप जीतने वाली टीम को ही क्रिकेट की दुनिया का अघोषित चैंपियन माना जाता है.

हक़ीक़त यह है कि पहले विश्वकप के आयोजन के बाद की लगभग आधी सदी के दौरान वही वनडे टूर्नामेंट क्रिकेट विश्व में तमाम तरह के परीक्षणों के मंच के तौर पर उभरा है.

वह चाहे स्पिनर के जरिए गेंदबाजी की शुरुआत करना हो या फिर पिंच हिटर से ओपनिंग करा कर विपक्ष को बिखेरने का प्रयास हो.

ऐसे अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं. लेकिन विश्वकप में आजमाए गए इन परीक्षणों में से कुछ लंबे समय तक जारी रहे तो कुछ समय की मांग पर खारिज कर दिए गए. पुराने फार्मूले को बदल कर नए फार्मूले भी आजमाए गए हैं.

इस रिपोर्ट में हम ऐसे पांच नए प्रयोगों का जिक्र करेंगे जिनको पहली बार विश्वकप क्रिकेट के मंच पर ही व्यापक रूप से आजमाया गया था.

यह नहीं कहा जा सकता कि यह सब सुपरहिट रहे, लेकिन इन सबको लेकर क्रिकेट विश्व में काफी हलचल मची थी. विशेषज्ञ और क्रिकेट प्रेमी इनके समर्थन और विरोध में कमर कसते हुए तरह-तरह की दलीलें दे रहे थे.

ऑफब्रेक से परेशान बून और मार्श

साल 1992 में आयोजित पांचवें विश्वकप में ही पहली बार क्रिकेटरों के लिए रंगीन जर्सी, सफेद गेंद और काले रंग की साइट स्क्रीन और डे-नाइट मैचों की शुरुआत हुई थी.

लेकिन आयोजक देश न्यूजीलैंड के कप्तान मार्टिन क्रो ने एक छोर से अपनी टीम के स्पिनर दीपक पटेल से गेंदबाजी की शुरुआत कर सबको चौंका दिया था.

कीनिया में जन्मे दीपक पटेल के लंबे समय तक इंग्लैंड में खेलने के बावजूद चयनकर्ताओं की नजर उन पर नहीं पड़ी थी.

कुछ हद तक मजबूर होकर उन्होंने न्यूजीलैंड में बसने का फैसला किया था. हालांकि उनको न्यूजीलैंड की राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था.

वहां उनकी प्रतिद्वंद्विता जान ब्रेसवेल के साथ थी. लेकिन 1992 के विश्वकप ने दीपक के करियर को एक नई दिशा दे दी.

उस टूर्नामेंट में गेंद की चमक खत्म होने से पहले ही उसे स्पिनर के हाथों में सौंपने की क्रो की योजना काफी कामयाब रही थी. दीपक पटेल ने कप्तान क्रो की उस योजना को सार्थक तरीके से हकीकत में बदला था.

ऑस्ट्रेलिया के जाने-माने ओपनर डेविड बून और ज्योफ मार्श की जोड़ी को शुरुआती ओवरों में दीपक पटेल की आफब्रेक गेंदों को संभलाने में काफी संघर्ष करना पड़ा था.

छोटे से मैदान में भी वह दोनों पटेल की गेंदों को हवा में उठा कर नहीं मार पा रहे थे.

मार्टिन क्रो-दीपक पटेल की जोड़ी कमाल

सेमीफाइनल में पाकिस्तान से हार कर भले न्यूजीलैंड विश्वकप से बाहर हो गया. लेकिन पूरे टूर्नामेंट में 3.10 की इकोनॉमी रेट की वजह से दीपक पटेल सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज चुने गए थे.

लेकिन सफेद गेंद से खेले जाने वाले क्रिकेट में स्पिनर से गेंदबाजी आक्रमण की शुरुआत करने की परंपरा धीरे-धीरे काफी लोकप्रिय हो गई. किसी दौर में जिसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, वह आज क्रिकेट विश्व में एक लोकप्रिय तरीका बन गया है.

मशहूर खेल कमेंटेटर आयुष मंजूनाथ कहते हैं, "क्रिकेट विश्व अब इसका अभ्यस्त हो गया है. अब हम टी20 मैचों में भी हमेशा स्पिनरों से गेंदबाजी आक्रमण की शुरुआत कराते देखा जा सकता है. एक दौर में आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स की ओर से खेलते समय सुनील नारायण नियमित रूप से ऐसा करते थे."

अब कई गेंदबाजों ने यह कला बखूबी सीख ली है कि चमक नहीं उतरने के बावजूद नई गेंद से कैसे स्पिन गेंदबाजी करनी होगी और बल्लेबाजों पर अंकुश लगाए रखना होगा.

मंजूनाथ इसका श्रेय मार्टिन क्रो-दीपक पटेल की जोड़ी को देना चाहते हैं. साल 2019 के विश्वकप में सो टूर्नामेंट की पहली गेंद ही दक्षिण अफ्रीका के स्पिन गेंदबाज इमरान ताहिर ने की थी.

जयसूर्या-कालूवितरणा का तूफान

विश्वकप के शुरुआती आयोजनों में हर मैच 60-60 ओवरों का होता था जिसे बाद में घटा कर 50-50 ओवरों का कर दिया गया था.

इनमें से आखिरी 10-15 ओवरों को स्लाग ओवर कहा जाता था. तब तमाम दल शुरुआत में टिक कर खेलने औऱ विकेट बचाए रखने के बाद आखिरी ओवरों में तेजी से खेल कर अधिक से अधिक रन जुटाने का प्रयास करते थे.

साल 1975 के विश्वकप में तो भारत के महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर तो इंग्लैंड के खिलाफ आयोजित मैच में पूरे 60 ओवर खेल कर महज 36 रन पर नाबाद रहे थे.

उनका स्ट्राइक रेट 20 से थोड़ी ज्यादा था. उस समय भारतीय टीम के ज्यादातर सदस्य वनडे क्रिकेट के सिद्धांत के अनुरूप खुद को नहीं ढाल सके थे. इसी वजह से ओपनिंग के लिए उतरे गावस्कर ने विशुद्ध टेस्ट मैच की तर्ज पर ही बल्लेबाजी की थी.

इसके दो दशक बाद साल 1996 में भारतीय उपमहाद्वीप में आयोजित विश्वकप टूर्नामेंट के दौरान क्रिकेट विश्व ने हैरत से देखा कि श्रीलंका के सलामी बल्लेबाज सनत जयसूर्या और रमेश कालूवितरणा किस तरह वन डे क्रिकेट का व्याकरण ही बदल रहे हैं.

उस समय तक पहले 15 ओवरों के दौरान मैदान में फील्डरों के प्लेसमेंट के नियम शुरू हो गए थे. जयसूर्या और कालूवितरणा की सलामी जोड़ी ने इसी का फायदा उठाते हुए पहले ही ओवर से ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करते हुए विपक्ष के गेंदबाजी आक्रमण की धज्जियां उड़ाने लगे.

विश्वकप में इन दोनों बल्लेबाजों के धमाकेदार प्रदर्शन के बाद ही क्रिकेट शब्दकोश में 'पिंच हिटर' शब्द जुड़ गया था. वैसे, करियर की शुरुआत में जयसूर्या और कालूवितरणा दोनों मध्यक्रम के बल्लेबाज थे.

पावरप्ले ओवरों में पूरी ताकत से गेंदों को मारने की उनकी क्षमता का फायदा उठाने के लिए श्रीलंका ने उनको बल्लेबाजी क्रम में प्रमोशन देकर सलामी बल्लेबाज के तौर पर मैदान में भेजा था. इस रणनीति ने श्रीलंका को वह टूर्नामेंट जीतकर विश्व चैंपियन बनाने में भी अहम भूमिका निभाई थी.

इस टूर्नामेंट के ठीक सात साल बाद दक्षिण अफ्रीका में आयोजित पहले विश्वकप में सनत जयसूर्या की कप्तानी में श्रीलंका खेलने पहुंची थी. तब मैंने उनसे पूछा था कि वह लोग शुरुआती में जोरदार तरीके से हिट करने की रणनीति से क्यों हट गए हैं?

जयसूर्या का सहज जवाब था, "वैसा खेलने के लिए आपके सामने कालूवितरणा जैसा जोड़ीदार चाहिए. कालू के बाद मुझे वैसा कोई बल्लेबाज नहीं मिला जिसके साथ जोड़ी बना कर उस तरह खेलना संभव होता."

उन्होंने उस दिन बीबीसी बांग्ला से कहा था, "यह सोचिए कि उस समय हमारी टीम के शीर्ष और मध्य क्रम में कौन कौन बल्लेबाज थे....अर्जुन रणतुंगा, अरविंद डिसिल्वा और अशोक गुरुसिंघे जैसे खिलाड़ी."

जयसूर्या की दलील थी कि बैटिंग लाइनअप में जब इतने बड़े बड़े बल्लेबाज हों तो सलामी बल्लेबाज उस तरह का खतरा उठा कर बड़े शॉट्स खेल ही सकते हैं.

कई क्रिकेट विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि श्रीलंका से भी पहले साल 1992 के विश्वकप में न्यूजीलैंड ने अपने निचले क्रम के बल्लेबाज मार्क ग्रेटबैच से ओपनिंग करा कर या इंग्लैंड ने अपने ऑलराउंडर इयान बॉथम को बल्लेबाजी क्रम में ऊपर भेज कर काफी हद तक ऐसा ही प्रयोग किया था.

श्रीलंका के बाद कई अन्य टीमें भी अपने बेहतरीन पिंच हिटरों से पारी की शुरुआत करा कर पावरप्ले का फायदा उठाने का प्रयास कर चुकी हैं.

ठीक इसी तरह भारतीय टीम की ओर से किसी दौर में वीरेंद्र सहवाग (किसी दौर में तेंदुलकर भी) या ऑस्ट्रेलिया की ओर से मैथ्यू हेडन और एडम गिलक्रिस्ट भी पारी की शुरुआत कर चुके

ग्लव्स के भीतर स्क्वाश बॉल

फुटबॉल विश्वकप में ब्राजील को जो स्थान हासिल है, क्रिकेट विश्वकप में वही रुतबा आस्ट्रेलिया का है.

जिस तरह ब्राजील पांच बार फीफा विश्वकप जीत चुका है, उसी तरह आस्ट्रलिया भी अब तक आयोजित 12 क्रिकेट विश्वकप टूर्नामेंट में से पांच में विजेता रहा है.

साल 2007 में कैरेबियन में जब इस टीम ने चौथी बार विश्वकप जीता था तो फाइनल में एक अद्भुत नजारा देखने को मिला था. ऑस्ट्रेलिया के विकेटकीपर-बल्लेबाज एडम गिलक्रिस्ट ने तब 72 गेंदों में शतक ठोक कर मैच जिताऊ पारी खेली थी.

शतक लगाने के बाद जब दर्शकों का अभिवादन करने के लिए उन्होंने अपने बल्ले को आसमान की ओर उठाया था तो टीवी कैमरे के क्लोजअप में उनके हाथ के बैटिंग ग्लव्स का एक हिस्सा कुछ फूला हुआ नजर आया.

मैच के बाद गिलक्रिस्ट ने खुद ही बताया कि बल्ले की ग्रिप को मजबूत करने के लिए ही उन्होंने ग्लव्स के भीतर एक स्क्वाश गेंद रखी थी.

विजडन के क्रिकेट विशेषज्ञ कैलम ट्रैनमैन बताते हैं कि ग्लव्स के भीतर स्क्वाश की गेंद रखने का मकसद यह है कि बल्ला पकड़ से फिसले नहीं और उसे और मजबूती से पकड़े रखा जा सके.

वह कहते हैं, "इससे आपको स्ट्रेट या सीधे खेलने में सहायता मिलेगी औऱ आप बल्ले के फुल फेस या सामने के पूरे हिस्से का इस्तेमाल कर सकेंगे. गिलक्रिस्ट ने ठीक यही किया था."

श्रीलंका की आपत्ति

लेकिन फाइनल मैच में हारने वाली श्रीलंका की टीम उस दलील को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड के तत्कालीन सचिव कंगदारन मथिवानन ने फाइनल के बाद ही आईसीसी को भेजे पत्र में आरोप लगाया था कि एडम गिलक्रिस्ट ने जो किया है वह पूरी तरह अनैतिक है.

आईसीसी की ओर से कोई प्रतिक्रिया आने से पहले ही विश्व क्रिकेट के नियमों की रक्षा करने वाले एमसीसी ने बाकायदा बयान जारी कर बता दिया था कि ग्लव्स के भीतर स्क्वाश की गेंद रख कर गिलक्रिस्ट ने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया है. बयान में कहा गया था, "हम मानते हैं कि यह क्रिकेट के किसी नियम का उल्लंघन नहीं है. यह खेल भावना के भी खिलाफ नहीं है." एमसीसी के बयान के बाद इस विवाद का अंत हुआ.

उसके बाद से ही दुनिया भर के कई बल्लेबाज अपने ग्ल्वस के भीतर अपनी सहूलियत के मुताबिक कुछ न कुछ बाहरी चीज रखते रहे. हालांकि अब इस बारे में बात नहीं होती.

डेथ ओवरों में यॉर्कर का कहर

साल 2015 के विश्वकप फाइनल से एक दिन पहले ही ऑस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क ने टूर्नामेंट के बाद क्रिकेट से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया था.

अगले दिन होने वाले फाइनल में उन्होंने न सिर्फ मैच जिताने वाला प्रदर्शन किया बल्कि अपनी ठोस रणनीति से विपक्षी न्यूजीलैंड के सबसे बेहतर हथियार ब्रैंडन मैकुलम की धार भी भोथरी कर दी थी.

उस टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज रहे मैकुलम फाइनल में महज तीन गेंद खेल कर मिचेल स्टार्क की गेंद पर शून्य पर बोल्ड हो गए थे. पूरी न्यूजीलैंड टीम भी 183 रन पर सिमट गई थी.

मैच के बाद क्लार्क ने खुद अपनी उस रणनीति का खुलासा करते हुए कहा था, "मैंने अपने गेंदबाजों से कहा था कि यॉर्कर गेंदों से मैकुलम को काबू में करना होगा. चाहे जैसे भी हो, उनको फेंकी गई हर गेंद यॉर्कर होनी चाहिए."

विश्वकप का वह फाइनल इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि आधुनिक क्रिकेट में यॉर्कर गेंद गेंदबाजों के लिए कितना बड़ा हथियार बन गई है.

बल्लेबाज के पैर के सामने पिच की गई यह फुल-लेंथ डिलीवरी अब डेथ ओवरों में रन रोकने के लिए अच्छे गेंदबाजों के लिए जरूरी है!

लसिथ मलिंगा, जसप्रीत बुमराह या मिचेल स्टार्क जैसे गेंदबाजों ने यॉर्कर को एक नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है.

विराट कोहली का क़बूलनामा

भारतीय क्रिकेट के महान खिलाड़ी विराट कोहली ने वर्ष 2011 के विश्वकप फाइनल में श्रीलंका के खिलाफ एक मुश्किल दौर में बल्लेबाजी करने मैदान पर उतर कर गौतम गंभीर के साथ शतकीय साझेदारी की थी. उनकी 35 रनों की पारी ने ने जीत की नींव रखने में काफी सहायता की थी.

उस पारी के बाद कोहली ने एक इंटरव्यू में कहा था, "मुझे सिर्फ इस बात का डर था कि मलिंगा कहीं पहली गेंद ही यॉर्कर न फेंकें. किस्मत से पहली गेंद यॉर्कर नहीं थी. मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि अगर वह सचमुच यॉर्कर होती तो मैंने क्या किया होता."

कोहली की यह सहज स्वीकारोक्ति इस बात का सबूत है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज भी एक अच्छे यॉर्कर की कितनी प्रशंसा करते हैं.

हालांकि विश्वकप के इतिहास के पहले दौर में यॉर्कर या धीमी गेंद तेज गेंदबाजों का हथियार नहीं थी.

इंग्लैंड में आयोजित पहले दोनों विश्वकप में वेस्टइंडीज लगभग आसानी से जीता था. उसमें उसकी पेस बैटरी की सबसे अहम भूमिका रही थी. इसमें एंडी रॉबर्ट्स, माइकल होल्डिंग और जोएल गार्नर जैसे मशहूर नाम शामिल थे.

दिल्ली में बीबीसी के क्रिकेट विश्लेषक आदेश गुप्ता बताते हैं, "होल्डिंग या गार्नर जैसे गेंदबाज तेज शॉर्ट पिच गेंदों या बाउंसर पर ही ज्यादा भरोसा करते थे. हमने उनको ज्यादा यॉर्कर गेंद फेंकते नहीं देखा है. इसके अलावा इंग्लैंड या ऑस्ट्रेलिया की तेज पिचों पर यॉर्कर ज्यादा काम नहीं आता. 1987 या 1996 में उपमहाद्वीप में विश्वकप के आयोजन के दौरान ही इस इलाके की धीमी पिचों पर यॉर्कर गेंद फेंकने की शुरुआत हुई."

बुमराह-मलिंगा-स्टार्क के अलावा पाकिस्तान के वसीम अकरम और वकार यूनुस, ऑस्ट्रेलिया के ब्रेट ली या फिर दक्षिण अफ्रीका के डेल स्टेन जैसे कई गेंदबाज विश्वकप के दौरान बल्लेबाजों की रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर चुके हैं.

बारिश के नियम के डकवर्थ लुइस मेथड तक

क्रिकेट के मैदान में खेल को कभी भी रोक देने के लिए बारिश सबसे बदनाम है. क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे इंडोर स्टेडियम में खेलना संभव नहीं है. यही वजह है कि कई मैचों के नतीजों के लिए प्रकृति पर भरोसा करने के अलावा आयोजकों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं होता.

बारिश से बिघ्नित मैचों में ओवरों में कटौती के बाद भी हार-जीत का फैसला कैसे होगा, इस मुद्दे पर विभिन्न मौकों पर विभिन्न फार्मूले आजमाए जाते रहे हैं.

क्रिकेट विशेषज्ञों में इस बात पर आम राय है कि वनडे क्रिकेट के शुरुआती दौर में इसके लिए जो नियम बनाया गया था, वह बाद में बल्लेबाजी करने वाली टीम के लिए काफी फायदेमंद था.

साल 1992 के विश्वकप में इस दिक्कत को दूर करने के लिए आईसीसी ने एक नया रेन रूल शुरू किया. महान ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर रिची बेनो समेत कई अन्य विशेषज्ञों को लेकर गठित एक पैनल ने यह नियम बनाया था.

इस नियम की मूल बात यह थी कि अगर बारिश के कारण बाद में बल्लेबाजी करने वाली अपने कोटे के पूरे ओवर नहीं खेल सकी तो पहले बल्लेबाजी करने वाली टीम ने जिन ओवर में सबसे कम रन बनाए हैं उसी के अनुपात में दूसरी टीम के लिए नया लक्ष्य तय किया जाएगा.

लेकिन इस नियम ने ही सिडनी में इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका के बीच होने वाले सेमीफाइनल मैच को एक मजाक बना दिया.

इस मैच में एक समय दक्षिण अफ्रीका को जीत के लिए 13 गेंदों पर 22 रन की जरूरत थी. बारिश के कारण कुछ देर खेल बंद रहने के बाद रेन रूल के मुताबिक जब नया लक्ष्य तय किया गया तो उसे वह 22 रन महज एक गेंद पर बनाने थे.

रेन रूल के प्रयोग का दौर वहीं खत्म हो गया. इसके कुछ साल बाद विकल्प के तौर पर डकवर्थ लुइस मेथड बनाया गया.

इंग्लैंड के सांख्यिकीविद फारुख डकवर्थ और टोनी लुईस ने जटिल गणितीय फार्मूले के आधार पर बारिश से प्रभावित होने वाले मैचों के नतीजों के लिए जो हल सुझाया था उसे ही मौजूदा दौर के आधुनिक क्रिकेट ने स्वीकार कर लिया है.

साल 1997 में शुरू होने के बावजूद आईसीसी ने पहली बार 1999 के विश्वकप में ही इसका इस्तेमाल किया था.

दक्षिण अफ्रीका को लगी सबसे पहले चपत

इसके बाद से ही मैच के दिन बारिश की आशंका रहने की स्थिति में दोनों टीमों के कप्तान जेब में डकवर्थ लुईस की गणना का हिसाब लेकर रहने लगे. टीम का सपोर्ट स्टाफ़ हर ओवर के बाद बदलने वाला लक्ष्य ड्रेसिंग रूम से उनको भेजने लगे.

साल 2003 के विश्वकप के दौरान डरबन में एक गलत हिसाब के कारण ही श्रीलंका के खिलाफ मैच में असहाय तरीके से हार कर आयोजक दक्षिण अफ्रीका ने टूर्नामेंट से विदा ले ली थी. उसके कारण ही शाॉन पोलक को कप्तानी से हाथ धोना पड़ा.

बारिश से पहले मैच की आखिरी गेंद का हिसाब जाने बिना दक्षिण अफ्रीका के मार्क बाउचर ने गेंद को मिड विकेट की ओर धकेला था. हालांकि उस गेंद पर महज एक रन लेने की स्थिति में उनकी टीम जीत गई होती.

उस समय जेब में हिसाब का कागज लेकर श्रीलंका के कप्तान सनत जयसूर्या मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे.

गलत हिसाब के कारण हारने के बाद शून्य की ओर ताकती शॉन पोलक की उदास निगाहों को आज भी क्रिकेट प्रेमी विश्व कप के दुखद क्षणों में से एक के तौर पर याद करते हैं.

डरबन के किंग्समीड स्टेडियम में दक्षिण अफ्रीका के लिए अभिशप्त उस रात को मैं भी वहां मौजूद था. दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट प्रेमी काफी देर तक यह विश्वास ही नहीं कर पा रहे थे कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने क्या घटते देखा है.

उस विश्वकप में आईसीसी ने पत्रकारों को जो टूर्नामेंट गाइड दिया था उसमें डकवर्थ लुईस के बारे में लिखा था कि इट्स द नियर परफेक्ट सॉल्यूशन इन दिस इम्परफेक्ट वर्ल्ड. आईसीसी के ऐसा कहने का मतलब था कि दुनिया की हर समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है. लेकिन यह पूर्णता के सबसे करीब है.

क्रिकेट के खेल में भी पूर्ण मैनुअल जैसा कुछ शायद नहीं होता. हर दौर में या नई पीढ़ी के खेल के तौर-तरीके और नियम-कानून लगातार बदलते रहते हैं. विभिन्न किस्म के प्रयोग भी चलते रहते हैं.

बीते करीब पचास वर्षों से दुनिया की बेहतरीन क्रिकेट टीमें विश्वकप को ही इन परीक्षणों की प्रयोगशाला बनाती रही हैं. भारत में होने वाला आगामी विश्वकप भी निश्चित ही इसका अपवाद नहीं होगा.

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